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साहित्य, कला, और डिज़ाइन

सरहपाद का गीतिकोष

बौद्ध पांडुलिपि का आवरण ।  मेट्रोपोलीटन म्यूज़ीयम ऑफ़ आर्ट (12वीं सदी)

बौद्ध पांडुलिपि का आवरण । मेट्रोपोलीटन म्यूज़ीयम ऑफ़ आर्ट (12वीं सदी)

कुछ दिन पहले मुझे कोलंबिया के अपभ्रंश रीडिंग ग्रुप के साथ सरहपाद रचित गीतिकोष को पढ़ने का मौका मिला ।  सरहपाद (८वी. शताब्ती) बौद्ध धर्म की सिद्ध परम्परा के सबसे प्रसिद कवि थे —  और उनका दोहागीतिकोष हिन्दी संत साहित्य परम्परा का महत्त्वपूर्ण स्त्रोत प्रतीत होता है । ( इस प्रसंग में हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की पुस्तक ‘कबीर‘ देखें । )

पढ़े गये दोहों में से कुछ को यहाँ प्रस्तुत करता हूँ , अपने मानक हिन्दी अनुवाद के साथ ।


(जिवँ) लोणु विलिज्जइ पाणियहिं तिवँ जइ चित्तु विलाइ ।

अप्पा दीसइ परहिं सवुँ तत्थ समाहिए काइँ ।। 42

जैसे नमक पानी में विलीन होता है वैसे चित्त विलीन हो जाता है ।

तब आत्मा दिखती है परम(ात्मा) समान, फिर समाधि क्यों (करें) ?


जोवइ चित्तु ण-याणइ बम्हहँ अवरु कों विज्जइ पुच्छइ अम्हहँ ।

णावँहिं सण्ण-असण्ण-पआरा पुणु परमत्थें एक्काआरा ।। 43

चित्त ब्रह्म देखता है पर उसे जानता नहीं, हम से पूछता है- और (दूसरा) कौन है ?

नाम देने से संज्ञा व जड़ पृथक हो जाते हैं, पर परमार्थ से वे एकाकार हैं ।।


खाअंत-पीअंतें सुरउ रमंतें अरिउल-बहलहो चक्कु फिरंतें ।

एवंहिं सिद्धु जाइ परलोअहो मत्थएं पाउ देवि भू-लोअहो ।। 44

खाता-पीता, रति करता, अरिकुल के बहुसंख्यों के बीच चक्र फिराता ।

ऐसे ही सिद्ध परलोक है जाता, रखकर भूलोक के मस्तक पर पाँव ।।


जहिं मणु पवणु ण संचरइ रवि-ससि णाहिं पवेसु ।

तहिं वढ चित्त विसामु कुरु सरहें कहिउवएसु ।।45

जहाँ पवन का संचालन नहीं हो, जहाँ रवि-शशि का प्रवेश नहीं हो ।

वहाँ, ओ मूर्ख चित, विश्राम कर, यह सरह का कथित उपदेश है ।।


एक्कु करु मा बिण्णि करु मा करु वण्ण-विसेसु ।

एक्कें रंगें रंजिअउ तिहुअणु सअलु असेसु ।। 46

एक करो, द्वै मत करो, मत करो वर्ण-विशेष (वर्ण-भेद) ।

एक रंग से रंजित है सकल त्रिभुवन, अशेष ।।


आइ ण अंतु ण मज्झु तहिं णवि भवु णवि णिव्वाणु ।

एहु सो परम-महासुहउँ णवि परु णवि अप्पाणु ।। 46

वहाँ न आदि न अंत न मध्य, न भव न निर्वाण ।

यही परम-महासुख, न पर न आत्मा ।।


एंड्रू ओलेट, दलपति राजपुरोहित, जस्टिन बेन-हेम व मनप्रीत कौर को धन्यवाद ।

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