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साहित्य, कला, और डिज़ाइन

मध्यकालीन अपभ्रंश की रचना : धणवाल (धनपाल) की भविसयत्तकहा

जैन पांडुलिपि का आवरण । लकड़ी । १२वीं शताबदी (ईस्वी)  । मेट्रोपॉलिटन म्युज़ीयम ऑफ़ आर्ट ।

जैन पांडुलिपि का आवरण । लकड़ी । १२वीं शताबदी (ईस्वी) । मेट्रोपॉलिटन म्युज़ीयम ऑफ़ आर्ट ।

पिछले सप्ताह मेरे मित्र और संस्कृत तथा प्राकृत के सुघड़ विद्वान ऐंड्रू ओलेट (Andrew Ollett) ने हमारा परिचय एक रुचिर व सुन्दर रचना से करवाया — मध्यकालीन जैन कवि धणवाल (धनपाल) की भविसयत्तकहा (भविष्यदत्त कथा)।

ओलेट जी कोलम्बिया यूनिवर्सिटी का अपभ्रंश रीडिंग ग्रुप के संदर्भ में हमें इस रचना का परिचय दे रहे थे ।  सुनने में आश्चर्यजनक लगता है कि किसी अम्रीकन विश्वविद्यालय के प्रांगण में छात्र अपभ्रंश का साहित्य पढ़ रहे हैं — परंतु आजकल यू.एस. के अनेक विश्वविद्यालयों में सिर्फ़ हिंदी की नहीं, बल्कि संस्कृत, प्राकृत, उर्दू, तमिल, कन्नड़, मलयालम, तेलुगु, पंजाबी तथा बंगला की पढ़ाई हो रही है — तो अपभ्रंश क्यों नहीं ।  (यह अलग बात है कि जबकि पश्चिमी देशों में अपभ्रंश के सीखनेवाले लोगों की संख्या क्रमशः बढ़ती जा रही है, हिन्दुस्तान में अपभ्रंश जाननेवाले विद्वानों की संख्या तेज़ी से घट रही है ; इसके कई राजनीतिक व आर्थिक कारण हैं, जिनकी बात कभी और करूँगा । ख़ैर…)  उस दिन पाँच लोग ग्रुप की मीटिंग में आये थे, और हम सब ने मई की प्यारी-सी धूप में बैठकर साथ में भविसयत्तकहा का शुरुआती हिस्सा पढ़ा ।

धणवाल का जीवनकाल ठीक से ज्ञात नहीं है ; कुछ विद्वान उसे दसवीं शताब्दी का मानते हैं, तो कुछ उसे चौदहवीं शताब्दी का ठहराते हैं ।  भविसयत्तकहा में मूलतः तीन कथाएं हैं , जिनका प्रसंग एक व्यापारी-राजा के चरित्र से है । इन कथाओं के सभी उपाख्यानों का अर्थ उपदेशात्मक है । ये कथाएं मध्यकाल की आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों पर काफ़ी प्रकाश डालती हैं, साथ-ही-साथ धणवाल की रचना अपभ्रंश भाषा तथा साहित्य का विशेष नमूना है ।

पढ़े गये पदों में से एक को यहाँ प्रस्तुत करता हूँ , अपने मानक हिन्दी अनुवाद के साथ । इस पद में कवि विद्वानों तथा कोविदों से क्षमा मांगते हुए कहते हैं कि हालंकि मुझे कविता लिखने का आधिकार नहीं तथापि यह काव्य लिखने के लिए बाधित हूँ —


किं करमि खीणविहवप्पहाए नउ लहमि सोह सज्जणसहाए ।

अह णिद्धणु जणु सोहइ ण कोइ धणुसंपय विणु पुण्महिं ण होइ ।

विणु ताएं जइ जणि अप्पमाणु कह मुवमि तोवि पुरिसाहिमाणु ।

वरि करमि किंपि णियमइवियासु कम्मक्खयाइं सुविसुद्धलेसु ।

जसु जित्तिउ बुद्धिवियासु होइ सो तित्तिउ पयडइ मच्चलोइ ।

पिक्खिवि अइरावउ गुलुगुलंतु किं इयरहत्थि मा मउ करंतु ।

महकव्वकइहु ताहतणिय किर कवण कह ।

किं उइइ मयंकि जोयंगणउं म करु पह ।।२।।


मैं क्या करूँ इस क्षीण विभासित प्रभा (अपनी क्षीण बुद्धि) का,

क्या सज्जनों की सभा से शोभा न लूँ ?

अतः निर्धन जन शोभित नहीं होता,

और बिना पुण्य धनसंपत्ति प्राप्त नहीं होती ।

यद्यपि इस (धनसंपति) के बिना मैं (लोगों के बीच) अल्पमानित हूँ,

तथापि कैसे अपने पुरुष अभिमान से मुक्ति पाऊँ?

इस से तो बहतर हो कि मैं अपनी मति के विकास के अनुसार करूँ (लिखूँ),

और क्षति (के बावजूद) लेषमात्र विशुद्धता से कर्म करूँ,

मनुष्य की बुद्धि जितनी विकसित हो,

वह मृत्युलोक में उतनी ही प्रकट होती है ।

ऐरावत को गुलुगुलते हुए देखकर,

क्या दूसरे हाथी मद न करें ?

वस्तुतः महाकाव्य के विषय में क्या कहूँ —

क्या उदित चंद्रमा देखकर तारे प्रभा न दें ?


एंड्रू ओलेट, दलपति राजपुरोहित, जस्टिन बेन-हेम, व ज़ोई हाए को धन्यवाद ।

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