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साहित्य, कला, और डिज़ाइन

रविदास जी पर अंतर्विषयक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी : 23-24 फरवरी 2015

अभी मेरे पास इस संगोष्ठी की प्रस्तावना (Concept Note) आयी है. — प्रवासी

Ravidas. Detail from a miniature by Mir Kalan Khan (active ca. 1730–75) depicting several saints. Watercolor and gold on paper.

Ravidas. Detail from a miniature by Mir Kalan Khan (active ca. 1730–75) depicting several saints. Watercolor and gold on paper.

संत गुरु रविदास जी पर अंतर्विषयक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी

दिनांक: 23-24 फरवरी 2015,स्थानकन्वेंशन सेंटर, जे.एन.यू. नई दिल्ली

Contact: 09958593550,09968560806 Email: icosgrjee@gmail.com

सम्माननीय महोदय/महोदया,

सादर अभिवादन!

संत रविदास पर यह दो दिवसीय संगोष्‍ठी के आयोजन का विचार अनायास नहीं आया, बल्कि इक्‍कीसवीं शताब्‍दी की चुनौतियों ने हमें बाध्‍य किया कि हम चौदहवीं शताब्दी  में प्रदत्त सतगुरु संत रविदास के चिंतन-‍दर्शन से रूबरू हों। क्‍योंकि उनका चिंतन-दर्शन भविष्‍य का एक ऐसा रोडमैप प्रस्‍तुत करता है जो किसी भी व्‍यक्ति को निजी रूप में और बेहतर नागरिक के रूप में विकसित करने में निरंतर ऊर्जा प्रदान करता है। गौरतलब यह भी है कि, उनका चिंतन सभी प्रकार के पूर्वाग्रहों, स्‍वार्थों व संकीर्णताओं से मुक्‍त है, जिसकी वर्तमान सदी में बेहद आवश्‍यकता है। इस संगोष्ठी की प्रासंगिकता व अनिवार्यता को समझने के लिए जरूरी है कि बेहतर भविष्‍य के प्रति जागरूक नागरिकों  के समक्ष संत रविदास के बहुआयामी व्‍यक्तित्‍व की एक झलक प्रस्‍तुत की जाए।

आज भी गुरु रविदास के बेगमपुरा यानी ऐसे शहर की संकल्‍पना जहां गम/दुख आदि के लिए कोई जगह नहीं है, हमें बेहद आकर्षित करती है। यह बेगमपुरा की अवधारणा आज भी बेजोड़ है। यह, जहां एक ओर आज की ज्‍वलंत समस्‍या ‘बेरोजगारी’ के विकल्‍प के रूप में ‘डिग्निटी ऑफ लेबर’ और श्रमण/श्रमिक संस्‍कृति के संरक्षण की वकालत करती नजर आती है तो वही दूसरी ओर धार्मिक पाखंड के खिलाफ जबरदस्‍त चुनौती भी प्रस्‍तुत करती है। यह गुरु रविदास की, एक तीर से दो निशाने की अवधारणा यानी ’’श्रम को ईसर जानि के, जऊपूजहिं दिन रैन। रैदास तिन्हहि संसार में, सदा मिलिहिं सुख चैन।।‘‘ दूसरी ओर, हमारे  गमों/दुखों से मुक्ति को सुनिश्चित करती है।

आज भाग्‍य, भगवान, तीर्थ, स्‍नान और न जाने कितने प्रकार के तथाकथित धार्मिक क्रियाकलाप मनुष्‍य और मनुष्‍यता के बड़े शत्रु के रूप में उभर कर हमारे सामने आ रहे हैं। ऐसे धार्मिक पाखंडों से मुक्ति के लिए गुरु जी, मन की शुद्धता व श्रम को ही प्राथमिकता प्रदान करते हैं और वे हमें-‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ जैसा सूत्र देते हैं, जो आज भी  प्रत्येक व्‍यक्ति को दुख रहित बनाने की गारंटी देता है। इतना ही नहीं जाति ही सभी प्रकार की ऊंच-नीच व भेदभाव के चलते मनुष्‍यता की दुश्‍मन है। वे कहते है

‘‘जाति-पांति के फेर में उरझी रह्यो सब लोग,

मानुषता को खात है जांत-पांत का रोग।‘‘

ऐसा नहीं कि गुरु रविदास का चिंतन-दर्शन सिर्फ किसी जाति, व्‍यक्ति या किसी बेगमपुरा तक ही सीमित था। उनके चिंतन में सम्पूर्ण विश्‍व की चिंता साफ झलकती है जब वे कहते हैं-‘ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्‍न’। साफ है कि जिस ‘खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ की बात आज हो रही है, उसे गुरु जी ने चौदहवी सदी में ही ताल ठोककर पेश कर दिया था। संत रविदास की जीवन शैली व रोजी-रोटी के लिए अपनाया गया व्‍यवसाय उनकी एक तस्‍वीर प्रस्‍तुत करता है लेकिन जब उनके चिंतन-दर्शन से रूबरू होते हैं तो एक अद्भुत तस्‍वीर सामने आती है। कहने का मतलब है कि चाहे जिस स्थिति में हम हैं, लेकिन आसमान छूने की संभावनाएं सब में विद्यमान रहती हैं। हमें जरूरत अपने-आप को पहचानने की है, बस!

अक्‍खड़ता व आक्रामकता के बनिस्‍पत संवादधर्मिता एवं मानवीय प्रेम की वकालत करने वाले गुरु रविदास आज जाति, धर्म, देश की सीमाओं से परे अपने चिंतन-दर्शन के कारण पुरे विश्व में समादृत हैं। उनके अ‍नुयायी विश्‍व भर में मौजूद हैं। तथागत बुद्ध, डा. अम्‍बेडकर व कबीर की तरह गुरु जी का चिंतन-दर्शन समाज में एक नए सांस्‍कृतिक परिवर्तन की लहर आलोड़ित कर रहा है।

लेकिन खेद व आश्चर्य का विषय है कि गुरु रविदास के व्‍यक्तित्‍व एवं कृतित्‍व पर अकादमिक जगत में अभी तक संतोषजनक कार्य नहीं हो पाया है। जैसे सतगुरु कबीर अकादमिक जगत में काफी पठित, पाठित एवं समादृत हैं; वैसा सतगुरु रविदास के साथ नहीं हैं| जबकि चिंतन की दृष्टि से दोनों परस्पर, एक दुसरे से पूरक नज़र आते है।

आगामी 23-24 फरवरी 2015 को जवाहरलाल नेहरु विश्‍वविद्यालय के भारतीय भाषा केन्‍द्र के तत्‍वाधान में आयोजित दो दिवसीय अंतर्विषयक अंतर्राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का आयोजन के पीछे दो मकसद हैं।

एक-गुरु रविदास के बहुआयामी व्‍यक्तित्‍व की समकालीन परिस्थितियों में प्रासंगिकता के संबंध में विचार-विमर्श करना।

दो-समाज में गुरु रविदास के क्रांतिकारी व्‍यक्तित्‍व को चमत्‍कारी व्‍यक्तित्‍व तक सीमित करने के निहितार्थों की जांच-पड़ताल करना। इस महत्ती कार्य में आप सभी प्रबुद्धजनों की सक्रिय बौद्धिक सहभागिता अपेक्षित है।

मुख्‍य विषय- दलित समाज, सांस्कृतिक रूपांतरण एवं संतगुरु रविदास 

उप-विषय :-

  1. 1. दलितों के सांस्कृतिक रूपांतरण में संतगुरु रविदास की भूमिका
  • 2. रविदसिया धर्म: अवधारणा, उद्देश्य एवं निहितार्थ
  1. 3. इक्‍कीसवीं सदी में सतगुरु रविदास की प्रासंगिकता
  • 4. अमृतवाणी: संकल्पना एवं निहितार्थ
  1. 5. मध्यकालीन समाज एवं दलित वर्ग
  • 6. बौद्ध धर्म एवं संतगुरु रविदास
  • 7. संतगुरु रविदास का समकालीन समाज पर प्रभाव
  • 8. सिक्ख धर्म एवं संतगुरु रविदास
  • 9. संतगुरु रविदास का सांस्कृतिक चिन्तन
  • 10. हिन्दू धर्म एवं संतगुरु रविदास
  • 11. संतगुरु रविदास का आर्थिक चिन्तन
  • 12. संत कवियों के स्त्री विषयक दृष्टिकोण
  • 13. संतगुरु रविदास का दार्शनिक चिन्तन
  • 14. संतगुरु कबीर एवं संतगुरु रविदास : वैचारिक अंत: सम्बन्ध
  • 15. संत गुरु रविदास: दंतकथाओं के सामाजिक निहितार्थ 
  • 16. संतगुरु रविदास की शिष्य परम्परा
  • 17. बेगमपुरा की संकल्पना और संत कवियों की विश्वदृष्टि
  • 18. संत रविदास की उपेक्षा के निहितार्थ
  • 19. आदर्श राज्य की संकल्पना और बेगमपुरा
  • 20. संत गुरु रविदास जी से संबंधित विभिन्न गुरूद्वारे, मंदिरों एवं आश्रमों की सामाजिक-सांस्कृतिक उपादेयता 
  • 21. संतगुरु रविदास का सामाजिक चिन्तन
  • 22. सामाजिक न्याय एवं संत गुरु रविदास

शोधपत्र प्रस्तुत करने हेतु दिशा निर्देश

  1. 1. शोध-सार हिंदी या अंग्रेजी में, 300 से 500 शब्दों का होना चाहिए| हिंदी के लिए Kruti Dev 010 और अंग्रेजी के लिए Times New Roman फॉण्ट एवं MSWord फोर्मेट का इस्तेमाल करें|
  2. 2. शोध-सार (Abstract) भेजने की अंतिम तिथि : 30 जनवरी  2015
  3. 3. पूर्ण शोध-पत्र भेजने की अंतिम तिथि : 05 फरवरी 2015
  4. 4. पूर्ण शोध पत्र में भी हिंदी के लिए Kruti Dev 010 और अंग्रेजी के लिए Times New Roman फॉण्ट एवं MSWord फोर्मेट का इस्तेमाल करें|
  5. 5. शोध सार एवं पूर्ण शोध पत्र की सॉफ्ट कोपी icosgrjee@gmail.com  पर निर्धारित तिथि के अंदर मेल कर दें|
  6. 6. संगोष्ठी से सम्बन्धित अन्य सूचनाएं प्रतिभागियों के व्यक्तिगत ईमेल पर अलग से भेजीं जाएगी| संयोजक

डॉ. राजेश पासवान 

एसोसिएट प्रोफेसर (हिंदी)

M-09958593550

Email-: icosgrjee@gmail.com

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This entry was posted on जनवरी 25, 2015 by .

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