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रमज़ी बराउद : तिहाड़ जेल में चाय-पान

barbed_wireफ़िलिस्तीन के पत्रिकार/कवि रमज़ी बराउद ने (रफ़ीक़ कथवरीकी सहायता से) अफ़ज़ल गुरु के बारे में यह मार्मिक और ज़ोरदार कविता लिखी है।

ब्लॉगर/कवियत्री सीपीया वर्स ने हिन्दी में उसका अनुवाद किया है।

तिहाड़ जेल में चाय-पान

चुस्कियाँ लीं
फिर हौले से चला
सर उठा के
हलके इशारे से करता
सलाम जल्लाद को
आँखें जी में गड़ती थीं
दाढ़ी शोख़-बेबाक
उस क़ाज़ी को याद कर
जो मुकर्रर करवाता रहा
कालेपानी के काग़ज़ात ।
बजाय उसके, वो ग़ुर्राया नाम
उन गुज़रे पुरखों के जो उस जैसे
हिमालय से चौड़े खड़े रहे ।
और उस आख़िरी सैर के दौरान
याद आया उसे
माँ का ममता-भरा हाथ
अपना बेटा ग़ालिब, जिसका नाम
अपने पसंदीदा शायर पे रखा था उसने
छूटे हुए यार-दोस्त
भोले-बचकाने ख़्वाब
आसमानी जन्नत
ये मैदान
जहाँ शैतान बच्चे
नहीं सीखते
क़ैद होने की तमीज़
ऊँची-भूरी दीवारों वाले
बंद कमरे में
डाला गया जबरन
पेट्रोल गुदा में
अफ़ज़ल गुरु को चूर करने को
उसकी शक्ल-ओ रूह वाले
कितने ही औरों को भी ।
रंगत उसकी शक्ल की
झुलसी हुई ख़ाक सी
लब थमे नहीं
ज़िक्र करते रहे
वो आख़िरी नज़्म
जल्लाद का बयान था
ख़ुदा के ये शैतान बच्चे
जियें हरदम आज़ाद
.
.
और देखें –
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