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साहित्य, कला, और डिज़ाइन

जयपुर साहित्य सम्मेलन 2013: नॉवल ऑफ़ द फ्यूचर (भावी उपन्यास)

नॉवल ऑफ़ द फ्यूचर (भावी उपन्यास) – सेशन को देखें jaipur_literary_festival1

सम्मेलन के प्रबन्धकों ने उपन्यास शैली के भविष्य पर छह प्रसिद्ध उपन्यासकारों को विमर्श करने बुलाया – हॉवर्ड जेकबसन, नदीम असलम, लिंडा ग्रान्ट, लॉरेंस नॉर्फ़ोल्क, ज़ोइ हेलर तथा अनीता आनन्द।  अफ़सोस की बात है कि पश्चिम में अंग्रेज़ी उपन्यास के अलावा अन्य भाषाओं और देशों के उपन्यास की बात नहीं की गयी; फिर भी वाचकों की कुछ बातें विचारणीय रहीं।  उदाहरण स्वरूप –

कुछ वाचकों को डर था कि नयी मीडिया टेक्नोलोजी के प्रभाव में लोगों का अटेंशन स्पैन – यानी एक वस्तु पर ध्यान देने की क्षमता – जल्दी क्षीण हो रहा है, और इसकी वजह से लोगों में उपन्यास पढ़ने का धैर्य नहीं रह गया है।  लॉरेंस नॉर्फ़ोल्क ने उल्लेख किया कि कुछ समय पहले तक संगीत सुनने के लिये, वाद्य स्वयं बजाना होता था। नाटक-मंचन तथा कहानी-वाचन के प्रमुख सामाजिक पहलू सिनेमा और टी.वी. के काल  में काफ़ी हद तक खो गये हैं।  जबकि पहले कहानी का रस-भोग करने के लिये आपको स्वयं किताब पढ़नी पड़ती थी, आजकल लोग ख़ाली बटन दबाकर पूरी दुनिया के मनोरंजक प्रोग्राम ग्रहण कर सकते हैं।  “पहले आपको कुछ पाने के लिये कुछ देना पड़ता था… अब, आपको सिर्फ़ बटन दबाना होता है।”

जब हम इन्टरनेट पर विडियो वगैरह देखते हैं, तो लगता है कि हमें मुफ़्त में यह सब कुछ मिल रहा है। लेकिन यथार्थ में इस का भुगतान बाद में किया जाता है।  नॉर्फ़ोल्क के शब्दों में, “The cost is deferred.”।  हमारी चेतना पर वेबसाइट्स में प्रस्तुत विज्ञापनों का भारी असर पड़ता है, चाहे इस का बोध जल्दी न हो। उन्होंने यह भी कहा कि “इसलिये हमें अपने बच्चों को ऐसे मानसिक हमलों से बचाने के लिये वैचारिक कवच देने चाहियें।”

उपन्यासकार लिंडा ग्रैंट को इसका डर नहीं था कि उपन्यास की शैली जल्दी ही ख़त्म होनेवाली है, क्योंकि अपनी दुनिया को समझने के लिये मनुष्य को कथाएँ चाहिये, और उनकी दृष्टि में उपन्यास कथा कहने का समर्थ साधन है। इस प्रसंग में उन्होंने अंग्रेज़ी लेखक जॉन बर्जर के शब्दों को उद्धृत किया – “अगर हर घटना के लिये एक संज्ञा होती, तो कथाओं की ज़रुरत नहीं होती।  लेकिन अस्तित्व में जीवन हमारी शब्दावली को पछाड़ देता है। शब्द नहीं मिल पाता है, तो कथा सुनानी पड़ती है।”(1)

1. John Berger (Once in Europa 1983:77): “If every event which occurred could be given a name, there would be no need for stories.  As things are here, life outstrips our vocabulary.  A word is missing and so the story has to be told.”

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