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साहित्य, कला, और डिज़ाइन

जयपुर साहित्य सम्मेलन 2013 – नदीम असलम की साहित्य साधना

jaipur_literary_festival1परसों जयपुर का साहित्य सम्मेलन सम्पन्न हुआ-  हर साल की तरह इस साल भी अनेक देशों से साहित्य-भक्त हज़ारों की संख्या में जयपुर के डिग्गी पैलेस में सतसंग करने और अपने इष्ट साहित्यकारों का दर्शन करने आये थे।  जयपुर साहित्य सम्मेलन, जो पिछले छः साल से हर जनवरी में होता है और एशिया का सबसे बड़ा साहित्य सम्मेलन है, अनेक दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है – यह कोर्परेशन और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से संचालित किताब-रूपी वस्तु का बाज़ार है; कुछ प्रगतिशील लेखकों और विचारकों को सुनने का मौका है; सेलेब्रिटियों तथा नेताओं की पार्टी है; अंग्रेज़ी व हिन्दी में नये साहित्य का गंभीर संवाद है।  असल में इस सम्मेलन को लेकर ये सारे वाक्य एक तरह से सच भी हैं, इसलिये इस बहस में जाने के बजाय अगली चार पोस्टों में मैं पाठकों के सामने इस साल के सम्मेलन की कुछ दिलचस्प बातें रखना चाहूँगा, ताकि वे सम्मेलन के वेबसाइट पर अलग-अलग सेशंस के विडियो देखकर, और वाचकों के मुँह से बातें सुनकर, सम्मेलन पर ख़ुद अपनी राय बना सकें।

लिखने की प्रक्रिया पर नदीम असलम के विचार

पिछले साल मैंने नदीम असलम का उपन्यास ‘द वेस्टिड विजिल’ पढ़ा था — जिस में उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान युद्ध से पीड़ित समाज का इतना सजीव एवं दुखद दृश्य खड़ा किया है कि जब तक मैं उसे पढ़ रहा था, तब तक मेरी दुनिया भी जैसे तहस-नहस लग रही थी।  कुछ किताबों की ऐसी सजीव व सजग दुनिया होती है कि उस से निकलकर वापस असली दुनिया में आना मुश्किल हो जाता है।  नदीम की किताबें मेरे लिये कुछ ऐसी ही थीं।  उनका नया उपन्यास ‘द ब्लाइंड मैन्स गार्डेन’ हाल ही निकला है, जिसके लिये असलम ने अनोखी प्रकार की रीसर्च की थी।  अपनी किताब के एक अंधे पात्र के अनुभवों व चेतना को समझने के लिये असलम ने तीन बार एक-एक हफ़्ते के लिये अपने आंखों पर पट्टा बाँधके दृष्टि के बिना जीना सीखा।  मसलन, एक दिन बारिश की आवाज़ सुनकर असलम ने अपनी हथेली खिड़की से बाहर फैला दी।  बारिश की टिमटिमाती बूंदों के स्पर्श ने उनको सितारों के चमकने की याद दिलायी। इस अनूठे अहसास को असलम ने अपनी किताब में एक अंधे पात्र के अनुभवों में सम्मिलित किया है ।

सुनील सेठी ने नदीम असलम का साक्षात्कार करते हुए उनसे लिखने की प्रणाली के विषय में भी कुछ सवाल पूछे।  जबाव देते हुए असलम ने ऐसी कुछ बातें कीं, जिन्हें सुनकर मुझे अपने लेखन के प्रति साहस मिला।  ऐसी कुछ बातें आप से बाँटना चाहूँगा जिनसे पेशेवर लेखक इत्तिफ़ाक़ रखेंगे और शौकिया लेखकों को भी शायद साहस मिले।

जब 14 साल की उम्र में अपने परिवार के साथ पाकिस्तान की ज़िया हुकूमत से बचते हुए एंग्लैंड गये तब असलम ने नये सिरे से अंग्रेज़ी भाषा सीखना शुरू किया।  धीमी और अड़चनों भरी शुरुआत के बावजूद भी अपनी मेहनत के बूते पर आज वे उत्तम श्रेणी के अंग्रेज़ी उपन्यासकार माने जाते हैं।  उन्होंने अपने कॉलेज काल में अंग्रेज़ी लेखक बनने का मन बनाके अंग्रेज़ी की सारी श्रेष्ठ कृतियाँ पढ़ने में पूरी जान लगायी।  उनको अपना पहला उपन्यास ‘सीज़न ऑफ़ द रेन बिर्ड्स’ लिखने में ग्यारह महीने लगे; जिस दौरान उन्होंने मज़दूरी करके अपना काम चलाया।  उनका कहना था, ‘कलाकार कभी ग़रीब नहीं होता, लेकिन मुझे [एंग्लैड की सर्दी में] अपने फ़्लैट को गरम भी रखना था।’  उनकी इस साहित्य साधना के बारे में सुनकर मुझे थोड़ा विश्वास मिला कि मैं भी मेहनत करके दूसरी भाषा में (जो कि मेरी मातृ-भाषा नहीं है) कुछ लिख पाऊँ।  हनूज़ दिल्ली दूर अस्त, मगर कोशिश जारी है।

उन्होंने यह भी कहा, ‘मुझे में ऐसी कोई ख़ास बात नहीं है… जो तजुर्बा मेरा रहा है, वह किसी का भी साँझा हो सकता है।  यह सिद्धान्त आधुनिकता-विरोधी है — आधुनिक कथा हमेशा ख़ुद से शुरू होती है, जबकि मैं हमेशा किसी के भाई, दोस्त, प्रेमी आदि के तौर पे लिखना शुरू करता हूँ…’ क्योंकि मैं ज़्यादातर पूर्व-आधुनिक साहित्य पर काम करता हूँ, यह बात मुझे ख़ास तौर पर विचारणीय लगी।

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