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रीव्यू : हमारे ज़माने का दुःस्वप्न — नैशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा का ‘उबू रोय’

उबू रोय (“उबू राजा”)

नाटककार : आल्फ़्रेड जार्री

मीरो — ‘उबू रोय न. 2’, 1966 ई.

निदेशक: दीपन शिवरमण

हिन्दी में रूपांतरण : राजेश तैलंग

मैं कुछ दिन पहले नैशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के अंतिम सालवाले छात्रों से मंचित “उबू रोय ” नाटक देखने गया, जो फ्रांसीसी प्री-एब्सर्डिस्ट थिएटर के नाटककार आल्फ़्रेड जार्री के सबसे मशहूर नाटक “उबू रोय ” का हिन्दी रूपांतरण है। आज के संदर्भ में, जब उदारवादी नीतियों के परिणाम स्वरूप हिन्दुस्तान के निवासियों के सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना पर उपभोक्तावाद, उदारवाद और पूंजीवाद का घोर हमला हो रहा है, जब इन शक्तियों द्वारा इस देश की सांस्कृतिक तथा कलात्मक परंपराएं विखंडित हो रही हैं, और नाट्य से संबंधित संस्थानों की प्रासंगिकता पर प्रश्न खड़ा किया गया है (एन.एस.डी. की प्रासंगिकता पर भी), तो हमें इस नाटक के मंचन में सोचने का बहुत कुछ मिलता है।

विचारणीय बात है कि हालँकि नाट्यशास्त्र में दर्शक को जानबूझकर ऐलियनेट करने की तकनीक बर्तोल्त ब्रेख़्त के epic theatre (“महाकाव्यात्मक नाट्य”) के सिद्धान्त से जोड़ी जाती है, लेकिन इस तकनीक का प्रयोग जार्री के इस नाटक में हुआ है, जो 1896 में लिखा गया। वस्तुतः उबू रोय” एब्सर्डिस्ट थिएटर (विसंागतित नाट्य) का पूर्ववर्ती रूप माना जाता है, और साधारणतः ऐसा माना जाता है कि एब्सुर्डिस्ट थिएटर अस्तित्ववाद से जुड़ा हुआ है। परंतु यह साफ़ है कि इस नाटक में जार्री ने विसंगति और एलियनेशन (अजनबीपन) की तकनीक का इस्तेमाल किसी अस्तित्ववादी बात रखने के बजाय पूंजीवादी व्यवस्था में बुर्जवा समाज की कड़ी आलोचना करने के लिये किया है, जिससे ब्रेख़्त भी निसंदेह प्रभावित थे।

असल में उबू रोयउबू पात्र पर आधारित तीन नाटकों में से एक है, जो जार्री ने युवावस्था में ही लिखना शुरु किया था। शुरुआत में जार्री ने कटपुतलियों के द्वारा नाटक के मंचन की कल्पना की, लेकिन बाद में उन्होंने उसको रंगमंच के योग्य रूप दिया। जैसे हम बाद में देखेंगे, कटपुतलियों से जुड़ी हुई इस परिकल्पना का झलक एन.एस.डी. से किये हुए मंचन में भी दिखता है।

नाटक की कथा उबू और उसकी पत्नि उबूमा पर केन्द्रित है ; नाटक की शुरुआत में उबू मंत्री है, जो राष्ट्रपति के सामने उसकी जीहुजूरी करता है, उसकी हाँ में हाँ मिलाता है और पीठ पीछे उसको हटाकर ख़ुद राष्ट्रपति बनने का सपना देखता है। उबू एक सेनापति दोस्त सेक्सक्रामेंटके साथ साजिश रचकर राष्ट्रपति और उसके पूरे परिवार का कत्ल कराता है; उसके राष्ट्रपति बनने के बाद उबू की लोभ की कोई सीमा नहीं रहती और उसके किये हुए अत्यचार को रोकनेवाला कोई नहीं रहता। उबू सत्ता और शक्ति के नशे में तानाशाह बन जाता : वह लगातार टैक्स को बढ़ाते हुए जनता को इतना दबाकर रखता है कि किसान आत्महत्या करते हैं; बच्चे भूख से मरते हैं। जब जनता इसका विरोध करती है, उबू लोकतंत्र के सारे संस्थानों – प्रेस, कला, प्रदर्शन – को ध्वस्त कर देता है। इतने में राष्ट्रपति का बेटा (जो किसी तरह से तख़्तापलट में ज़िंदा बच गया था ) वामपंथी क्रांतिकारी बनकर और उबू से तिरस्कृत सेनापति सेक्सक्रमेंट दुश्मन देश का जासूस बनकर, उबू से बदला लेने की योजना बनाते हैं। अंत में, उबू और उबूमा देश में पनपे विद्रोह और दुश्मन देश द्वारा छेड़े गये युद्ध से बचकर, आखिर में अनजान पर्यटकों के रूप में अपनी पुरानी राजधानी वापस आते हैं।

नाटक के लेखन और पात्रों की चरित्रों में मनोविज्ञान और मार्क्सवादी विचारधारा दोनों का असर दिखाई पड़ते हैं। नाटक का मुख्य पात्र, उबू, मानव स्वभाव के सारे दोषों का प्रतीक है : स्वार्थ, लोभ, क्रोध, काम, कायरता, अहंकार, आदि।१.  शारीरिक रूप से वह अत्यंत मोटा और बदसूरत है, मानसिक रूप से वह छोटे बच्चे जैसा है – टट्टी और पेशाव से मुग्ध, काम से चालित। वह कोई वस्तु देखता है, उसको चाहता है, और सीधे उसको ग्रहण करने की कोशिश करता है। लेकिन जिस तरह फ़्रायड के सिद्धान्त के संदर्भ में पिता वह एकमात्र शक्ति है जो बच्चे के वस्तु ग्रहण करने में बाधक डाल सकता है, नाटक के संदर्भ में उबू के लिये राष्ट्रपति पिता जैसा दिखता है – जब उबू एडिपस की तरह अपने पिता को मार डालता है, तब उसकी चाहत को रोकने के लिये कोई नहीं रहता।

नाटक के पहले दृश्य में ही उबू की चरित्र की भंगिमायें साफ़ हो जाती हैं : उबू लद्धड़ चाल से मंच पर आता है; थोड़े देर तक मल त्याग करने के बाद वह हंसहंसकर अपनी टट्टी को पटाखे से उड़ाता है। (एन.एस.डी. द्वारा मंचन में हलांकि अभिनेता ने हगने की सिर्फ़ नकल की, लेकिन उसने असली पटाखा फ़ोड़ा।) वह फिर छुपछुपके उबूमा के उबाले हुए सूप को पीता है – और कड़ाही में पेशाब करके अपनी कारस्तानी को छिपाता है। उबू जिस तरह सूप को चुराकर पीता है, उसी तरह वह बाद में राजनीतिक सत्ता को भी हथिया लेता है।

परंतु उबू की कहानी केवल मनोस्थितियों का अन्वेषण भर नहीं है – जार्री यह दिखाते हैं कि बुर्जुआ समाज के शिष्ट आचारके पीछे किस तरह का कुकर्म, कुचाल, कुमति, कुसंगति आदि होती है – और वे यह भी दिखाते हैं कि ऐसी बुर्जुआ शक्तियों के हाथ में लोकतंत्र कितनी जल्दी विकृत हो जाता है, और उसका बुरा इस्तेमाल कितनी आसानी से किया जाती है। इस संदर्भ में जार्री का नाटक साफ़ तौर पर परिहास के रूप में दिखाई देता है : जैसे शायद आप नोट कर चुके हैं, जार्री ने उबू रोयकी कथा शेकस्पीर के मैकबेथ‘, ‘हैमलेटऔर रिचर्ड द थिर्डसे उठायी है। मिसाल के तौर पर लेडी मैकबेथ की तरह उबूमा उबू के मन में राष्ट्रपति बनने को पैदा करती है और बाद में ख़ुद पागल हो जाती है; हैमलेट की तरह राष्ट्रपति का बेटा भूत देखकर अपने पिता के हत्यारों से बदला लेने की कल्पना करता है। लेकिन जार्री ने ऐसी चीज़ों को समकालीन पूँजीवादी समाज के संदर्भ में रखकर उनका मज़ाक उड़ाया है : जो चीज़ें शेक्सपीयर के मूल नाटकों में ट्रैजिक दिखती हैं, वे जार्री के नाटक में अत्यंत बदसूरत, निरर्थक, और हास्यास्पद लगती हैं। इस प्रकार जार्री ने इस बात का संकेत किया है कि पूँजीवाद हर चीज़ का दाम लगाकर उसके मानवी अर्थ को ख़त्म करता है, हर कार्य को कर्ता से अलग करके उस कार्य को अर्थहीन बनाता है। उबू की दुनिया इसलिये एब्सर्ड (विसांगतित, असंगत) है कि उसमें चीज़ों का कोई मूल्य नहीं – न तो मानव जीवन का कोई मूल्य है, न तो नीति का।

इस वजह से उबू की दुनिया में सब कुछ दुःस्वप्न जैसा दिखता है। मुक्तिबोध की कविता अंधेरे मेंकी तरह उबू रोयमें साधारण दुनिया – पूँजीवाद से विकृत होकर – दुःस्वप्न ही है, और इस प्रसंग में एन.एस.डी. का प्रयास प्रशंसनीय है। उनके द्वारा मंचन का शायद सबसे प्रभावशाली पहलू है सीनॉग्रफ़ी (मंचीय परिकल्पना) और वेशभूषा। नाटक का मंचन खुले में हुआ, एन.एस.डी. के कोर्टयार्ड में – उन्होंने थिएटर इन द राउंड (घेरेवाले थिएटर) के फ़ारमैट को अपनाया : आयताकार मंच के चारों तरफ़ सीढ़ीनुमा सीटों पर दर्शक बैठे थे। मंच और दर्शकों के बैठने की जगह क़टीले तार से बने तीन मीटर लम्बे बाड़े से घेरी हुई थी; बाड़े के ऊपर से ऐसे लैम्प टंगे हुए थे जिनको देखकर यह लगता था कि आप आउस्विट्ज़ जैसे किसी कैम्प (जेल) में बैठे हैं। इन भयानक दीवारों में जंग लगे दो बड़े दरवाज़े थे, जिन से अभिनेता आतेजाते रहते थे। इस के अलावा, कोई स्थायी सीनरी नहीं थी – अवश्यकतानुसार ज़ोर से आवाज़ करनेवाली मोटरसाइकल, सीनरी के विविध बड़े सामान – जैसे पलंग, मेज़, वग़ैरह – को मंच पर लाती थीं। मिसाल के तौर पर जब राजकीय सेक्रटेरी को बुलाया जाता था, एक मोटरसाइकल ऐसे ठेले को खींचकर मंच पर आती थी जिस पर सक्रेटेरी मेज़कुरसी पर बैठा हुआ टाइप कर रहा था, जिसका असर बेहद हास्यपूर्ण था।

वेशभूषा में कठपुतलियों के लिये नाटक की मूल परिकल्पना दिख रही थी – उबू और उबूमा का वेश जूट के ढीले बोरों से बना हुआ था; इस से दोनों की सूरत अत्यंत जीर्ण, मोटी और ढीली लगती थी। जो कंकाल राष्ट्रपति के बेटे को दिखाई देते हैं, वे स्टिल्ट (लकड़ी के लम्बे टुकड़े) पर चलकर घूमते हैं ; इस वजह उनकी लड़खड़ाती चाल से वे कटपुतलियों जैसे ही दिखते थे। अभिनेताओं के चेहरों पर हर तरह के नकाब देखने को मिले : मुर्गी का, बाज का, चूहे का, आदि। इस से उबू की दुनिया की विसंगति और साफ़ दिखती थी – वह सचमुच दुःस्वप्न ही है।

नाटक का मंचन एन.एस.डी. के आखिरी साल के छात्रों द्वारा किया गया है – जो एक तरह से उनकी अंतिम परीक्षामानी जाती है। अच्छा हो बुरा हो, लेकिन अक्सर लोग इस अंतिम प्रस्तुति द्वारा यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि उन्होंने पिछले तीन साल में क्या और कितना सीखा – उबू रोयको देखकर यही लगा। लेकिन जिस प्रकार बावर्ची को एक ही सब्ज़ी में ज़्यादा मसाले डालने से बचना चाहिये, उसी तरह निर्देशक या कम्पनी को एक ही नाटक में ज़्यादा टेकनीक डालने से बचना चाहिये। मेरी एक दोस्त के शब्दों में, “लगता है जैसे तीन साल में उन्होंने नाटक के बारे में जितना कुछ सीखा, उन्होंने सब बटोरकर इस नाटक में डाल दिया।”

फिर भी, आज के संदर्भ में ऐसे नाटक का मंचन करना बहुत ही महत्त्वपूर्ण और प्रशंसनीय बात है, और राजेश तैलंग (जिन्होंने मूल नाटक का रूपांतरण किया) और निर्देशक दीपन शिवरमण ने नाटक को आज की राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़ने की ख़ास कोशिश की। एक दृश्य में किसान उबू को बताता है कि जब कि सरकार ने घोषित किया है कि एक दिन में छब्बीस रूपये कमानेवाले आदमी ग़रीब नहीं है, सरकार से शिकायत करने की क्या गुंजाइश बची है ? जो साफ़ तौर पर यू.पी.. सरकार के योजना आयोग की कड़ी आलोचना है। दर्शकों के हंसने से और ताली बजाने से यह साफ़ लगा कि उबू रोयका तीर ठीक निशाने पर लगा।

— प्रवासी

१. उबू पात्र के जन्म की कथा इस तरह है : उनके बचपन में जार्री के निजी दोस्त, आँरे और शार्ल मोराँ, ने अपने एक घृणित शिक्षक को लक्ष्य बनाकर उसके बारे में कई बर्लेस्क नाटक लिखे; हालँकि बाद में बड़े होकर मोराँ भाइयों ने इस पात्र व इन नाटकों को छोड़ दिया, जार्री उनका विकास करते रहे।

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This entry was posted on जून 3, 2012 by .

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