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दलपत राजपुरोहित : “दकनी या क़दीम उर्दू?” वर्कशॉप का रीव्यू

प्रवासी का नोट : हर सत्र कोलम्बिया यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेंसिल्वेन्य से प्रयोजित एक हिन्दी-उर्दू वर्कशॉप होता है, जिस में इस तरह के पाठ, लेखक और परम्परा का सामुहिक अध्ययन होता है जो हिन्दी व उर्दू दोनों के इतिहास के प्रसंग में महत्त्वपूर्ण हैं।  सब लोग इस में आमंत्रित हैं — साहित्य के विद्वान, छात्र, सहृदय और आम जनता।  वर्कशॉप में रेजिस्ट्रेशन निशुल्क है, लेकिन पहले से रेजिस्टर करना ज़रुरी है।  अतिरिक्त जानकारी के लिये, या वर्कशॉप के विगत सेशंज़ के बारे में पढ़ने के लिये, यहाँ क्लिक करें।  वहाँ पर आपको वर्कशॉप से संबंधित सारी सामग्रियाँ मिलेंगी।  इस रीपोर्ट के लिये मैं दलपत सिंह राजपुरोहित का आभारी हूँ।

दलपत राजपुरोहित : A report of The Hindi-Urdu Workshop (Columbia University)

April 21st, 2012 

चंद हफ़्तों पहले न्युयॉर्क स्थित कोलम्बिया यूनिवर्सिटी में एक कार्यशाला (वर्कशॉप) का आयोजन हुआ। विषय था दकनी या क़दीम उर्दू?” अर्थात क्या दकनी प्राचीन उर्दूहै? दकनी नाम बहुतों को अनभिज्ञ नहीं होगा लेकिन संक्षेप में बता देना अनुचित न होगा कि यह साहित्य की वह धारा है जो हिन्दीउर्दू क्षेत्र के बाहर प्रवाहित हुई अौर बीजापुर, गोलकुंडा अादि जिसके प्रमुख केन्द्र थे। दकनी का साहित्य 14-15वीं सदी से मिलना शुरु हो जाता है। भाषाई एवम् साहित्यिक विशेषताअों के कारण दकनी का संबंध अाधुनिक खड़ी बोली हिन्दीउर्दू साहित्य के साथ भी जोड़ा जाता रहा है। इस वर्कशाप में हिन्दीउर्दू का अध्ययनअध्यापन करने वाले लोगों के अलावा अन्य लोग भी आए जो इस विषय में दिलचस्पी रखते हैं। कार्यशाला में मुहम्मद क़ुली कुतुबशाह (जो गोलकुंडा के सुल्तान थे अौर जिनको हैदराबाद शहर का संस्थापक माना जाता है) की कुछ ग़ज़लें अौर मुल्ला वजही के सबरसके कुछ अंश पढ़े गये। दकनी साहित्य पर लिखे गए अालेखों अौर पुस्तकों पर भी चर्चा की गई। इसी वर्कशॉप की एक रिपोर्टप्रस्तुत करते हुए कुछेक सवाल या जिज्ञासाएँ मैं पाठकों के सामने रखने का प्रयत्न कर रहा हूँ।

जे०एन०यू० के हिन्दी विभाग में पढ़ते समय हिन्दी भाषा का उद्भव अौर विकासनामक पर्चे में मैंने दकनी का पहली बार ज़िक्र सुना था। हिन्दी भाषा से संबंधित उस पर्चे के अलावा बाक़ी कहीं दकनी की चर्चा नहीं हुई। चूँकि उस कक्षा में सबरसपर चर्चा करते वक़्त हम दकनी हिन्दीशब्द का प्रयोग करते थे इसलिये इस वर्कशाॉप का विषय दकनीउर्दूमुझे थोड़ा अटपटा या यूँ कहूँ कि अनसुना लगा। इस वर्कशाॉप में दकनी पर जो अालोचनात्मक लेखन हमको पढ़ना था उससे मुझे यह ज्ञात हुअा कि उर्दू में स्थिति दूसरी है, वहाँ दकनी को क़दीमउर्दूकहा जाता रहा है। वली अौरंगाबादी को दकन अौर उत्तर के बीच की एक कड़ी भी माना जाता रहा है (हालाँकि इस पर पर्याप्त विवाद है)। फलत: “दकनी हिन्दीअौर दकनी उर्दूका मामला मेरे दिमाग़ में कईं दिनों तक घूमता रहा। जद्दोजहद इस बात की थी कि हिन्दी वाले दकनीको सिर्फ़ भाषागत विशेषताअों के कारण ही याद करते हैं कि दकनी साहित्य का व्याकरण बहुत कुछ उस खड़ी बोली का है जो अाधुनिक हिन्दी का अाधार है। दूसरी तरफ़ उर्दू वालों के अनुसार इसका व्याकरण तो खड़ी बोली का है ही जो उर्दू का अाधार है, उनका कहना यह भी है कि दकनी साहित्य के अरबीफ़ारसी रस्मे ख़त में लिखे जाने, शब्द भंडार अौर मसनवीतथा ग़ज़लजैसी विधाअों की प्रमुखता से यह साहित्य उर्दू के अौर क़रीब अा जाता है।

अगर नामकरण की ही बात की जाय तो दकनी साहित्य में दकनी‘, ज़बाने हिन्दुस्तानअौर हिन्दीजैसे शब्द इसकी भाषा के सन्दर्भ में प्रयोग किये गये हैं। मसलन सबरसका लेखक अपनी भाषा को हिन्दीअौर कभीकभी ज़बाने हिन्दुस्तानकहता है। यही बात हमें उत्तर भारत में लिखे गये भाषा साहित्य में दिखती है मसलन प्रेमाख्यानों के कवि अपनी भाषा को हिन्दवीया हिन्दुकीकहते हैं अौर ब्रजभाषा, मारवाड़ी के कवि अपनी भाषा को सिर्फ भाषा/भाखा कहते हैं। भाषा साहित्य में बहुत से कवि अपने साहित्य को फ़ारसी या संस्कृतप्राकृत से अलग करने के लिये भी भाषाया हिन्दवीइत्यादि शब्दों का प्रयोग करते थे। अाधुनिक काल में हमने कुछ ख़ास उद्देश्यों अौर साहित्यिक प्रवृत्तियों के चलते इस देशभाषा या लोकभाषा साहित्य1 को अपनेअपने यानी हिन्दी अौर उर्दू के इतिहासग्रंथों में स्थान दिया है अौर उनके साथ अपना संबंध भी स्थापित किया है। दकनी की ही बात की जाय तो हिन्दी में केवल भाषाई महत्व के कारण इसकी चर्चा होती है जनता की चित्तवृत्तिके अाधार पर रचित साहित्य की जो श्रेणियाँ बनाई गई हैं उनमें नहीं। वहीं उर्दू में भाषा, विधाअों अौर सवेंदनाअों के चलते इससे अपना संबंध जोड़ा गया है। अब मुख्य सवाल पर अाते हैं कि हम इसे क़दीम उर्दूकहें या दकनी हिन्दी” ? सवाल बहुत बड़ा है अौर एक विस्तृत शोध की माँग करता है। लेकिन जवाब देना इस रिपोर्ट का उद्देश्य भी नहीं। अाइये उत्तर खोजने की शुरुअात दकनी साहित्य से ही की जाय। अौर हाँ क़दीम उर्दूया दकनी हिन्दीजैसे नामकरणों को एक बार दिमाग से हटाकर।

दकनी के कुछेक ग्रंथों को पढ़ते समय मुझे लगा कि इसका व्याकरण एकसा यानी सिर्फ़ खड़ी बोली का ही नहीं है अौर इसमें व्याकरण के तत्व अभी पूरी तरह से मानकीकृत नहीं हैं, जैसे कि अब हैं। ऐसी बात भी नहीं है कि पूरा का पूरा दकनी साहित्य खड़ी बोली में है। 17वीं सदी सेजिसमें 1636ई० के अासपास सबरसलिखा गयादकनी साहित्य में खड़ी बोली के तत्व ज़्यादा दिखाई पड़ने लगते हैं। दकनी में अरबीफ़ारसी के अलावा तत्सम, तद्भव, ब्रज, पंजाबी, मराठी अौर कभीकभी तेलगू के शब्द अौर क्रिया पद भी अाते हैं।

चित्तवृत्तियों या संवेदनाअों की बात करें तो दकनी के साहित्य में अौर उत्तरभारत में उस दौर में रचित साहित्य में कुछ समान तत्व या संवाद की स्थिति पाते हैं। सबरस का कवि पोथी पढ़पढ़ जग मुअा“–जिसे हम कबीर की मानते हैंभाव वाली साखी ठीक उन्हीं शब्दों में अपने ग्रंथ के पहले ही पृष्ठ पर उद्धृत करता है। मुल्ला वजही इस साखी को चतुर लोगों की सीख के रूप में याद करते हैं। निज़ामी की मसनवी कदमराव पदमराव‘–जो 15वीं सदी की रचना हैतो तत्सम अौर तद्भव शब्दों से इस क़दर भरी है कि यदि इसकी लिपि देखकर इसे अरबीफारसी या उर्दू की परम्परा का ग्रंथ मानकर कोई पढ़ने बैठे तो झल्लाकर कहेगा कि यह कविता तो निहायत ही मुश्किल है! इस ग्रंथ में एक योगीजो अौर कोई नहीं मत्स्येन्द्र के शिष्य अघोरनाथ (गोरखनाथ?) हैंअौर राजा कदमराव के टकराव का वर्णन है। बहुत कुछ वैसा ही टकराव जैसा की सन्तों भक्तों का योगियों अौर नाथों से था। गोरख जगायो जोग भक्ति भगायो लोग को तो हम जानते ही हैं। उस दौर में जनजीवन पर योगियों के गहरे प्रभाव को हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी हिन्दी साहित्य की भूमिकामें रेखांकित किया है। दूसरी बात है रसविमर्श जो ब्रज, अवधी, मारवाड़ी इत्यादि सभी के साहित्य का अंग रहा है दकनी में भी उपस्थित है। 16वीं सदी में बीजापुर के सुल्तान इब्राहीम अादिलशाह-II ‘दोहाशैली अपनाते हुए नवरसों पर अपना काव्य किताबे नौरसलिखते हैं जिसमें रागभी हैं।

प्रारम्भिक अाधुनिक काल पर पिछले पाँच: वर्षों के अध्ययन से मेरी यह धारणा बन रही है कि भाषा अौर संवेदना का मामला इस काल में उतना सीधा नहीं जितना दिखता है या दिखाया गया है। भक्तिरीति काल के कवि अपनी साहित्यिक अौर संवेदनागत ज़रूरतों के चलते अरबीफ़ारसी की शब्दावली के साथ उनके विमर्श में भी भाग लेते थे अौर एकदूसरे के काव्यरूप भी लेते थे। कवि किस विषय पर कविता कर रहा है, किस सन्दर्भ में कर रहा है उसके अनुसार भाषा को वैसा रूप भी देता था अौर उसी अाधार पर शब्दों का चुनाव भी करता था। दकनी के कवि उसी काल में साहित्य सृजन कर रहे थे इसलिये वहाँ भी हम कुछ ऐसी ही स्थिति पाते हैं। जिस तरह दकनी के अादिलशाह द्वितीय नव रसों पर दोहे लिख रहे थे, 17 वीं सदी में दादूपंथी सुन्दरदास कहीं संस्कृतनिष्ट ब्रजभाषा में हठयोग अौर साँख्य दर्शन पर कविता लिखते हैं, कहीं फ़ारसीनिष्ट ब्रजभाषा में पीरमुरीदों के बीच दार्शनिक चर्चा करवाते हैं तो कहीं सरल ब्रजभाषा में सवैये भी लिखते हैं। वे अरबीफ़ारसी हुरूफ़ पर ककहराअौर बावनीशैली में भी कविता करते हैं। इस युग में साहित्यिक विधाएँ, संवेदनाएँ किसी ख़ास साहित्यिक समाज में ही सीमित नहीं थी अौर उन्हें इस या उस परम्परा का मानकर छोड़ नहीं दिया जाता था बल्कि उनमें संवाद अौर अावाजाही भी हो रही थी। ये कुछ ऐसी बातें हैं जो देशभाषा साहित्य को अाधुनिक हिन्दी अौर उर्दू साहित्य से विलक्षण बनाती हैं अौर अलग पहचान भी देती हैं।

यह वर्कशाॉप मेरे सामने कुछ सवाल, कुछ जिज्ञासाएँ छोड़ गया। अव्वल तो यही कि दकनीसाहित्य में कुछ ऐसा ज़रूर है जिसे हिन्दी वाले पढ़ते हैं तो उन्हें हिन्दीलगती है अौर उर्दू वाले पढ़ते हैं तो उन्हें यह उर्दूलगती है। लिपियों से जुड़े मुद्दों, साहित्येतिहासों द्वारा बनाई गई श्रेणियों जैसे मध्यकालीनअौर अाधुनिकतथा हिन्दीअौर उर्दूके प्रभाव पर सोचते हुए यह सवाल दिमाग़ में अाया कि क्या हम इस साहित्य को केवल दकनीही कहकर इसे पढ़ने अौर समझने का प्रयास कर सकते हैं? कुछेक दकनी ग्रंथों जिनका हिन्दी अनुवाद हो चुका है, के अलावा सारा दकनी साहित्य अरबीफ़ारसी रस्मेख़त में है जिसे जाने बिना उसे पढ़ा ही नहीं जा सकता समझना तो दूर की बात, लिपि अाज भी एक बड़ी समस्या है। सवाल बहुत हैं लेकिन जवाब खोजने इसी देशभाषा साहित्य अौर प्रारम्भिक अाधुनिक काल की अोर मुड़ना होगा। अाइये मुल्ला वजही के सबरसका एक शुरुअाती अंश पढ़ें जिसको पढ़ते समय शायद अाप को भी लगे कि इसमें कुछ हिन्दी का है अौर कुछ उर्दू का या कुछ पंजाबी, मारवाड़ी का, लेकिन क्या यह सिर्फ दकनी का हो सकता है?

होर ग्वालियर के चातुराँ, गुन के गुराँ, उन्हों भी बात को खोले हैं यूँ बोले हैंफ़र्द

पोथी थी सो खोटी भई पंडत भया न कोय

एकही अच्छर पेम का पढ़े सो पंडत होय

क़ुदरत का धनी सही जो करता सो सब वही। ख़ुदा बड़ा ख़ुदा की सिफ़त करे कोई कितेक। वहदहू लाशरीक। माँ न बाप, अपन अाप, परवरदिगार, संसार का सिरजनहार। जेती जे कोई क़ुदरत धरता है सिफ़त उसकी अपने परते करता है। वो बेहद उसकी सिफ़त कूँ काहे का हद। अहद समद लम यलद वलम यूलद। बैत

किसे है हद जो ख़ुदा की सिफ़त की हद पावे

हर एक बाल कूँ गर सौ हज़ार जीब अावे

धन्यवाद

दलपत राजपुरोहित, व्याख्याताहिन्दी उर्दू, कोलम्बिया युनिवर्सिटी, न्युयॉर्क

1लोकभाषासाहित्य या देशभाषा साहित्य का प्रयोग ब्रज, अवधी, मैथिली, मारवाड़ी, इत्यादि के साहित्य के संदर्भ में होता रहा है जिनकी रचना मोटा मोटी 13-14 वीं सदी से शुरु होती है।हिन्दी में भक्ति अौर रीति काल यानी 1400-1800 ई० के लिये अभी प्रारंभिक या पूर्व अाधुनिक कालशब्द का प्रयोग हो रहा है जो एक तरह से अंग्रेज़ी के अर्लीमाडर्न लिट्रेचरका छायानुवाद है। 

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This entry was posted on मई 28, 2012 by .

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