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साहित्य, कला, और डिज़ाइन

दलित स्त्री-विमर्श और साहित्य : दो नई किताबें

यथास्थिति से टकराते हुए : दलित-स्त्री-जीवन से जुड़ी कहानियां

कहानी संग्रह का लोकार्पण

अप्रैल 24, 2012

5:00 PM

स्थान : गांधी शान्ति प्रतिष्ठान, 221/223 दीन दयाल उपाध्यय मार्ग, नई दिल्ली (आई.टी.ओ. के पास) माप पर देखें

संपर्क : 9910343376, 9899700767, 9868261895

पिछले कई सालों से हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में (और हिन्दी साहित्य के बाहर भी) दलित स्त्री की चेतना और विमर्श का सवाल सामने आ रहा है : एक तरफ़, दलित स्त्री के प्रति डॉ. धर्मवीर आदि कुछ पुरुष लेखकों के कथन को लेकर यह साबित हो गया है कि फिलहास दलित विमर्श काफ़ी हद तक दलित पुरुष विमर्श तक सीमित रह गया है।  दूसरी तरफ़ दलित स्त्रियों ने यह भी दिखाया है कि आज तक भारत में स्त्रीवादी विमर्श मुख्यतः सवर्ण जातियों की स्त्री विमर्श होता आ रहा है।  इस संदर्भ में अनिता भारती और बजरंग बिहारी तिवारी से संपादित कहानियों का संग्रह ‘यथास्थिति से टकराते हुए : दलित-स्त्री-जीवन से जुड़ी कहानियां‘ एक प्रशंसनीय योगदान है।  संग्रह का लोकार्पण अप्रैल 24 को गांधी शान्ति प्रतिष्ठान पर हो है जिस में संपादकों के आलावा छः और वक्ता दलित स्त्री विमर्श और दलित स्त्री साहित्य पर बात करेंगे।

इस किताब में संपादकों ने दलित और गैर-दलित लेखकों की दलित स्त्री-संबंधित छोटी कहानियों का संकलन किया है।  यह उल्लेखनीय बात है क्योंकि पिछले कई महीनों से प्रगतीशील लेखक संघ के सम्मेलन में शुरु दलित साहित्य पर बहस का एक सवाल यह था कि क्या गैर-दलित लोग दलित साहित्य लिख सकते हैं ?  होलेवाले लोकार्पण में वक्ता कविलेन्द्र इन्दु का कहना है कि इस कहानी संग्रह का ताल्लुक़ issue (मुद्दे) से है, लेखक की अस्मिता से नहीं।  दरअसल इस संग्रह में सम्मलित कहानियाँ संकीर्ण प्रकार की अस्मितावाद के विरुद्ध इस बात की गवाही देते हैं कि दलित स्त्री की चेतना और अनुभव में कई विभिन्न अस्मिताओं का मिश्रण होता है।

इस प्रसंग में अंग्रेज़ी में एक और प्रशंसनीय प्रयास का ज़िक्र करना चाहूँगा : कुछ दिन पहले ज़ुबान बूक्स की तरफ़ से दलित स्त्रियों की समस्याओं पर एक नये शोध का रिपोर्ट निकला है, जो दलित स्त्री के जीवन और संघर्ष का सजीव दृश्य खड़ा करता है — ‘Dalit Women Speak Out: Caste, Class, and Gender Violence in India‘।  असल में यह नैशनल कैम्पेन ऑन दलित ह्यूमन राईट्स से आयोजित चार साल के अनुसंधान के रिपोर्ट का संशोधित और प्रकाशित रूप है।  2004 में नैशनल कैम्पेन ऑन दलित ह्युमन राईट्स ने दलित स्त्रियों से संबंधित जानकारी के अभाव को देखकर यह शोध शुरु कर लिया; उसका उद्देश्य था दलित स्त्री के खिलाफ़ भेद-भाव, जातिप्रथा, और हिंसा की जानकारी खोजकर उन पर रोशनी डालना।  तीन शोधकर्ता – अलोयसियस इरुदयम, जयश्री मंगुभाई, और जोएल ली ने चार प्रांतों में – तमिलनाद/पॉन्डीचैरी, आंध्र प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश – पांच सौ दलित स्त्रियों का साक्षात्कार करके 1999 से 2004 तक उनके प्रति भेद-भाव तथा हिंसा को रिकार्ड किया है।  इन लेखकों ने इन नारियों के कथनों से लिये हुए अंशों से दलित स्त्रियों के द्वारा सामना की जाती समस्याओं का सुस्पष्ट और प्रभावशाली विवरण किया है।

http://www.zubaanbooks.com/zubaan_books_details.asp?BookID=189

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One comment on “दलित स्त्री-विमर्श और साहित्य : दो नई किताबें

  1. praveen
    अप्रैल 25, 2012

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